मंगलवार, 3 मई 2016

क्या होती है कीड़ा जड़ी? What is cordyceps sinensis?

क्या होती है कीड़ा जड़ी? What is cordyceps sinensis?
सामान्य तौर पर समझें तो ये एक तरह का जंगली मशरूम है जो एक ख़ास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उसपर पनपता है। इस जड़ी का वैज्ञानिक नाम है कॉर्डिसेप्स साइनेसिस और जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर ये उगता है उसका नाम है हैपिलस फैब्रिकस। स्थानीय लोग इसे कीड़ा-जड़ी कहते हैं क्योंकि ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी है और चीन-तिब्बत में इसे यारशागुंबा कहा जाता है। ‘यारशागुंबा’ जिसका उपयोग भारत में तो नहीं होता लेकिन चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है।
सर्वप्रथम इसका उल्लेख तिब्बती साहित्य में मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार यहाँ के चरावाहों ने देखा कि यहाँ के जंगलों में चरने वाले उनके पशु एक विशेष प्रकार की घास जो कीड़े के समान दिखाई देती है, को खाकर हष्ट-पुष्ट एवं बलवान हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह घास एक चमत्कारी औषधि के रूप मे अनेक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग होने लगी। तिब्बती भाषा में इसको यारशागुंबा’ कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है ग्रीष्म ऋतु मे घास और शीत ऋतु ऋतु में जन्तु। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार यर्सी गम्बा हिमालयी क्षेत्र की विशेष प्रकार एवं यहाँ पाये जाने वाले एक कीड़े के जीवन चक्र के अद्भुत संयोग का परिणाम है।
शक्ति बढ़ाने में इसकी करामाती क्षमता के कारण चीन में ये जड़ी खिलाड़ियों ख़ासकर एथलीटों को दी जाती है। ये जड़ी 3500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती है जहां ट्रीलाइन ख़त्म हो जाती है यानी जहां के बाद पेड़ उगने बंद हो जाते हैं। मई से जुलाई में जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू जाता है रासायनिक दृष्टि से इस औषधि में एस्पार्टिक एसिड, ग्लूटेमिक एसिड, ग्लाईसीन जैसे महत्वपूर्ण एमीनो एसिड तथा कैल्सियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे अनेक प्रकार के तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन तथा मनुष्य शरीर के लिए अन्य उपयोगी तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसको एकत्रित करने के लिए अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। अगस्त के महिने से धीरे-धीरे प्राकृतिक रुप से इसका क्षय होने लगता है और शरद ऋतु के आने तक यह पूर्णतया: विलुप्त हो जाती है। वनस्पतिशास्त्री डॉक्टर एएन शुक्ला कहते हैं, “इस फंगस में प्रोटीनपेपटाइड्सअमीनो एसिडविटामिन बी-1, बी-और बी-12 जैसे पोषक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं। ये तत्काल रूप में ताक़त देते हैं और खिलाड़ियों का जो डोपिंग टेस्ट किया जाता है उसमें ये पकड़ा नहीं जाता।” कीड़ा-जड़ी से अब यौन उत्तेजना बढ़ाने वाले टॉनिक भी तैयार किए जा रहे हैं जिनकी भारी मांग है।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

क्या हैं गुरुत्वाकर्षण तरंगें Gravitational Waves?

क्या हैं गुरुत्वाकर्षण तरंगें Gravitational Waves?
वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज कर ली है। इनकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन्हें सदी की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। दशकों से वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या गुरुत्वाकर्षण तरंगें वाकई दिखती हैं। इसकी खोज करने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने लीज पाथफाइंडर नाम का अंतरिक्ष यान भी अंतरिक्ष में भेजा था।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से आज से तकरीबन 100 साल पहले ही इस बारे में भविष्यवाणी कर दी थी जोकि सही साबित हुई। इस खोज से न सिर्फ आइंस्टाइन का सिद्धांत प्रमाणीत हुआ है, बल्कि इससे पहली बार 2 टकराने वाले श्याम विवरों (ब्लैक होल) की भी पुष्टि हुई है।
आज से करीब सवा अरब साल पहले ब्रह्मांड में 2 श्याम विवरों (ब्लैक होल) में टक्कर हुई थी और यह टक्कर इतनी भयंकर थी कि अंतरिक्ष में उनके आसपास मौजूद जगह और समय, दोनों विकृत हो गए। आइंस्टाइन ने 100 साल पहले कहा था कि इस टक्कर के बाद अंतरिक्ष में हुआ बदलाव सिर्फ टकराव वाली जगह पर सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा था कि इस टकराव के बाद अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण तरंगें(ग्रैविटेशनल तरंगें) पैदा हुईं और ये तरंगें किसी तालाब में पैदा हुई तरंगों की तरह आगे बढ़ती हैं।
अब दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आइंस्टाइन की सापेक्षता के सिद्धांत (थिअरी ऑफ रिलेटिविटी) के सबूत मिल गए हैं। इसे अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है। ग्रैविटेशनल तरंगों की खोज से खगोल विज्ञान और भौतिक विज्ञान में खोज के नए दरवाजे खुलेंगे।
गुरुत्वाकर्षण तरंगें पर द्रव्य (matter) का कोई असर नहीं पड़ता और ये ब्रह्मांड में बिना किसी रुकावट के विचरण करती हैं।
गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने आंकड़ो के विश्लेषन(डेटा अनैलिसिस) समेत काफी अहम भूमिकाएं निभाई हैं। इंस्टिट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च. गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनामी ऐंड एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे और राजारमन सेंटर फॉर अडवांस्ड टेक्नॉलाजी, इंदौर सहित कई संस्थान इससे जुड़े थे।
गुरुत्वीय तरंगों की खोज का ऐलान आईयूसीएए पुणे और वाशिंगटन डीसी अमेरिका में वैज्ञानिकों ने किया। भारत उन देशों में से भी एक है, जहां गुरुत्वाकषर्ण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है।----आशीष श्रीवास्तव
इससे सालों से चल रही गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज का अंत होने की उम्मीद है और ब्रह्मांड के जन्म से जुड़े 'बिग बैंग' के सिद्धांत को समझने के लिए नई खिड़की खुल सकेगी---बी  बी  सी 


रविवार, 31 जनवरी 2016

क्या होता है एम्बर What is Ambar?

क्या होता है एम्बर What is Ambar?
जुरासीक पार्क पिक्चर याद है उसके डाक्टर को एम्बर में मच्छर  का जीवाश्म मिलता है जिसने डायनासोर का खून चूसा होता है .........एम्बर एक जीवाश्म रूप में रेज़िन यानी किसी पेड़ की गोंद है। यह एक किसी ऐसे वृक्ष का जीवाश्म रेज़िन(गोंद) है जो आज कहीं नहीं पाया जाता। इसको कपड़े रगड़ने से इससेआवेश पैदा होताहै। वृक्ष की  गोंद  जो समय के साथ सख़्त होकर पत्थर बन गई हो। यह देखने में एक कीमती पत्थर की तरह लगता है और प्राचीनकाल से इसका प्रयोग आभूषणों में किया जाता रहा है। यह आरम्भ में एक पेड़ से निकला गोंद होता है, इसमें अक्सर छोटे से कीट या पत्ते-टहनियों के अंश भी रह जाते हैं  जब  मानलो यह रिस रहा होता है उस समय कोई कीट पतंगा इस पर बैठ जाए तो वो इससे चिपक जाता था और उसका भी इसमें जीवाश्म रह जाता था। जब एम्बर जमीन में से निकलते हैं तो वह हलके पत्थर के ढ़ेले जैसे लगते हैं। फिर इनको तराशकर इनकी पॉलिश की जाती है जिस से इनका पीला भूरा रंग और चमक निकल आती है और इनके तब अन्दर झाँककर देखा जा सकता है। क्योंकि एम्बर किसी भी  कार्बन, आक्सीजन व हाइड्रोजन का ही तो योगिक होता है और  इन्हें अन्य हाईड्रोकार्बन की तरह जलाया जा सकता है। एम्बर का रासायनिक संगठन में पता चला है की  इससे दो अम्ल C20H30O4 सूत्र के, पृथक किए जा सके हैं, परंतु इन अम्लों के संगठन का अभी सही सही पता नहीं लगा है। 
अब नकली एम्बर भी काच और प्लास्टिक से बनने लगे हैं। नकली एम्बर  की स्पेसीफ़िक डेंसिटी अधिक होती है और यह अल्ट्रावायलेट किरणों से उसमें प्रतिदीप्ति नहीं आती। ऐंबर के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार फ़ौसिल रेज़िन भी अनेक देशों में पाए जाते और विभिन्न कामों में प्रयुक्त होते हैं। 



बुधवार, 6 जनवरी 2016

क्या है जेसीबी मशीन? What is JCB Machine?

क्या है जेसीबी मशीन? What is JCB Machine?
हमारे आस-पास ऐसी बहुत सी छोटी छोटी चीज़ें और बातें हैं जिनके बारे में हम जानना नहीं चाहते या जानना पसंद नहीं करते या फिर हमारा ज़ेहन ऐसा होता ही नहीं कि हम जानना चाहें। हम सबने सड़कों पर या किसी कंस्ट्रक्शन साईट पर "पीले रंग" की जेसीबी मशीन गाड़ी (JCB Machine) देखी होंगी और हम आये दिन देखते ही हैं। शायद ही कभी किसी ने सोचा हो कि इसका नाम JCB (जेसीबी) क्यूँ है?  
इस JCB (जेसीबी) का क्या मतलब है? JCB मशीन दुनिया कि पहली ऐसी मशीन है जो बिना नाम के मार्किट में सन 1945 में लाँच हुई। इसको बनाने वाले बहुत दिनों तक इसको क्या नाम दिया जाए इसी में परेशान रहे। और आपको बताऊँ कि JCB (जेसीबी) मशीन का नाम ना होकर इंजन का नाम है। जिन्होंने इस गाड़ी (मशीन) का आविष्कार 1945 में किया उनका नाम "जोसफ सायरिल बमफोर्ड" (Joseph Cyril Bamford) है और आविष्कार करने के बहुत दिनों बाद कोई नाम ना सूझने पर इस एक्स्कावाटर (Excavator) का नाम उन्ही के नाम के इनिशियल पर JCB रख दिया गया। यह मशीन कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट में पूरी दुनिया में एक नयी क्रांति लेकर आई। बेसिकली यह एक एक्स्केवेशन (Excavation) मशीन है। जिसका कोई टेक्निकल मैकेनिकल और एर्गोनोमिकल नाम है ही नहीं, इसलिए इसे टेक्निकली इंसानी नाम का ब्रांड बनाया गया, (जैसे कार एक मशीन है मगर ब्रांड और लिटरली हम उसे कार के नाम से जानते हैं)। यह दुनिया का पहला ऐसा ब्रांड है जिसे ट्रेडमार्क इसके आविष्कार के 65 साल बाद सन 2009 में किया गया। जेसीबी मशीन (JCB Machines) की एक और ख़ास बात यह है यह पहली "प्राइवेट" ब्रिटिश कंपनी थी जिसने भारत में अपनी फैक्ट्री लगायी थी और आज जेसीबी मशीन (JCB Machines) का पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट भारत से ही किया जाता है। जेसीबी  मशीन (JCB Machines) का रंग पूरे दुनिया में पिछले 65 सालों से पीला ही है। याद रहे की दुनिया का सबसे पुराना ट्रेडमार्क "टाटा संस" जो कि टाटा वालों का है और यह भारत के लिए गर्व करने की बात है।
------महफूज अली