बुधवार, 25 अप्रैल 2012

क्या ? ? आने वाला है मलेरिया को रोकने वाला टीका Maliria Vaccine

क्या?? आने वाला है मलेरिया को रोकने वाला टीका Malaria Vaccine
पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात लाख मानव मलेरिया के कारण असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं इस रोग का इतिहास बताता है कि आबादी की आबादी खत्म की है इसने, इसका उपाय सर्वप्रथम डी.डी.टी.के रूप में समक्ष आया पूरी दुनिया में लाखो टन डी.डी.टी. का छिड़काव किया गया, कईं देशो में अलग से मलेरिया उन्मूलन विभाग बनाए गए लेकिन डी.डी.टी.के रूप में मिला उपाय भी मलेरिया के उन्मूलन में सफल ना हो सका वरन् डी.डी.टी. अन्य कईं पर्यावरणीय समस्याएं ले कर पेश आया मलेरिया पर दवा के विकास का इतिहास को देखा जाए तो विश्व में मलेरिया के विरूद्ध टीके विकसित किये जा रहे है यद्यपि अभी तक 100% सफलता नहीं मिली है। पहली बार प्रयास 1967 में चूहों पर किया गया था जिसे जीवित किंतु विकिरण से उपचारित बीजाणुओं का टीका दिया गया। इसकी सफलता दर 60% थी। उसके बाद से ही मानवों पर ऐसे प्रयोग करने के प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह निर्धारण करने में सफलता प्राप्त की कि यदि किसी मनुष्य को 1000 विकिरण-उपचारित संक्रमित मच्छर काट लें तो वह सदैव के लिए मलेरिया के प्रति प्रतिरक्षा विकसित कर लेगा। इस धारणा पर वर्तमान में काम चल रहा है और अनेक प्रकार के टीके परीक्षण के भिन्न दौर में हैं। एक अन्य सोच इस दिशा में है कि शरीर का प्रतिरोधी तंत्र किसी प्रकार मलेरिया परजीवी के बीजाणु पर मौजूद सीएसपी (सर्कमस्पोरोज़ॉइट प्रोटीन) के विरूद्ध एंटीबॉडी बनाने लगे। इस सोच पर अब तक सबसे ज्यादा टीके बने तथा परीक्षित किये गये हैं। SPf66 पहला टीका था जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ, यह शुरू में सफल रहा किंतु बाद मे सफलता दर 30% से नीचे जाने से असफल मान लिया गया। आज RTS,S/AS02A टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है। आशा की जाती है कि पी. फैल्सीपरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण करने में आसानी होगी।
मलेरिया का टीका खोजना डॉक्टरों के लिए हमेशा से ही एक बड़ी चुनौती रहा है दुनिया भर के वैज्ञानिक मलेरिया उन्मूलन का कोई कारगर उपाय खोजने में लगे रहे बहुत से रासायनिक और गैर-रासायनिक मलेरिया उन्मूलन के तरीको पर काम हुआ तब जाकर अब मलेरिया से निबटने का उपाय यानि हथियार वैज्ञानिकों के हाथ लगने वाला ही हैब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने मलेरिया रोकने का टीका लगभग विकसित कर ही लिया है इन ब्रिटिश वैज्ञानिकों को इस टीके के पूर्व परिणामों में पूर्ण सफलता मिली है यह टीका मलेरिया परजीवी की सभी प्रजातियों जैसे प्लाज्मोडियम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल पर कारगर होगा परन्तु अभी यह शोध प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम पर केंद्रित है। प्लाज्मोडियम फैल्सीपरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण करने में तेज़ी आयी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीटयूट के डॉ़ सिमोन ड्रापर की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब एक ऐसा टीका विकसित किया है जो शरीर में खासतौर पर प्लाज्मोडियम फाल्सिपरम को निष्क्रिय कर देता है।
मलेरिया परजीवी रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में प्रवेश करके तीव्र गुणित होता है और फिर बीमारी को जन्म देता है। शोध दल के वैज्ञानिकों ने जो तरीका अपनाया वो था कि सर्वप्रथम उस प्रोटीन को पहचनाना जो मलेरिया परजीवी को लाल रक्त कणिकाओं तक पहुचने को आसान बनाता है। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी लाल रक्त कणिकाओं की सतह पर ‘बासिजिन’ नामक प्रोटीन को चुनता है और इस प्रोटीन के साथ ‘आर.एच.-5’ प्रोटीन को जोड़ देता है। इस क्रिया में लाल रक्त कणिकाओं में उसके लिए प्रवेशद्वार खुल जाता है जहां वह तीव्र गुणित होकर मलेरिया रोग को प्रकट करता है।
वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को रोकने के तरीकों पर काम किया और सफलता मिली, ‘आर.एच.-५’ प्रोटीन के विरुद्ध एंटीबॉडीज को प्रेरित कर के इस रोग को प्रकट होने से पहले ही रोकने में सफलता प्राप्त कर ली है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का यह सफल शोध नेचर कम्यूनिकेशन पत्रिका में छपा है। मलेरिया का टीका 2015 तक बाजार में आ जायेगायह भरोसा अणु जीव वैज्ञानिक डॉ. जो कोहेन ने दिलाया है। 68 वर्षीय इस मृदुभाषी वैज्ञानिक के पास मलेरिया के टीके का पेटेंट है। इस पर उन्होंने इसी सप्ताह तीसरे चरण का परीक्षण पूरा कर दिया है। उनका दावा है कि इसके टीकाकरण से पांच से लेकर 17 महीने के शिशुओं में 56 फीसद तक मलेरिया की रोकथाम में सफलता मिली है। इस दवा को गंभीर बीमारी के दौरान तीन खुराक देने पर 47 प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। इसका परीक्षण सब सहारा क्षेत्र के सात देशों में किया गया है। ये सारे परीक्षण टीके को बाजार में उतारने से पहले हो गये बताये जाते है। और इसके प्रभावों को कुछ माह के शिशुओं से लेकर बड़े बच्चों तक पर अच्छी तरह परखा जा चुका है। अगले दो से तीन साल में इंसानों पर भी इस टीके का इस्तेमाल शुरू करने की योजना है। 



बुधवार, 4 अप्रैल 2012

क्या है पुरुष स्तनवृद्धि ? What is Gynecomastia?

क्या है पुरुष स्तनवृद्धि? What is Gynecomastia? 

नोट: यह लेख कोई विशेषज्ञ लेख नहीं है मात्र जानकारी है
पुंस्तनबृद्धि  Gynecomastia   ग्य्नेकोमस्टिया
पुरुष स्तन वृद्धि
पुंस्तनवृद्धि या पुरुष स्तन वृद्धि उस स्थिति को कहते है जब पुरुष की स्तन ग्रन्थिया वृधि को प्राप्त होने लगती हैं इस अवस्था में पुरुष के स्तन समान्य से बड़े होने लगते हैं
Gynecomastia का उद्गम एक ग्रीक शब्द से है  यह मेडिकल साइंस का शब्द है जिस का समान्यतः मतलब है  महिला जैसी छातियाँ  “woman-like breasts"
नवजात शिशुओं में यदि यह लक्षण हों तो इसका कारण माँ से प्राप्त महिला हार्मोन हैं और यदि यह लक्षण किशोरावस्था में और प्रौढ़/बुजुर्ग अवस्था में हों तो यह एक असामान्य बीमारी या चयापचय संबंधी विकार के साथ जुड़े हालत  होते हैं  
मोटापा भी पुरुष स्तन वृद्धि का एक कारण हैं, इसके और भी बहुत से कारण हो सकते हैं बचपन, किशोर व युवा अवस्था में यह पुंस्तनवृद्धि लज्जा और हीनभावना का कारण बनती है समुद्रतट पर नहाना या सार्वजनिक स्थानों पर निवस्त्र होना शर्मनाक स्थिति पैदा करता है ज्यादातर लड़कों में जिनमे पुंस्तनवृद्धि की वजह मोटापा नहीं है उनमे स्तनों की वृद्धि वयस्कता की आयु तक पहुँचते तक बिना कोई उपचार के साथ अपने आप ही दूर (सिकुड़ ) हो जाती है
पुंस्तनवृद्धि के प्रकार 
पुंस्तनवृद्धि  के कारण  सामान्यतः पुंस्तनवृद्धि के कारण अभी तक अनिश्चित माने जाते हैं
संक्षेप में,
स्वास्थ्य की स्थिति सही ना होना
पुरुष हारमोन की कमी
बढ़ती उम्र
वृष्ण,अधिवृक्कग्रंथि, पियूष ग्रंथि में ट्यूमर का होना
गुर्दे की विफलता
अवटू ग्रंथि की अतिसक्रियता
यकृत की विफलता और सिरोसिस
कुपोषण और भुखमरी
सहवास के निष्क्रियता व अतिसक्रियता दोनों
 कई स्वास्थ्य स्थितियां हार्मोन के स्तर को प्रभावित कर पुंस्तनबृद्धि पैदा करती है व्यक्तिगत मामलों के लिए एक मूल कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता है कुछ खास व आम कारण यहाँ वर्णित हैं
नर जनन हारमोन टेस्टोस्टेरॉन का निम्न स्तर
एक स्थिति में यह छाती पर  मादा - हार्मोन संबंधी और नर - हार्मोन संबंधी प्रभाव के  असंतुलन के कारण भी हो सकता है
सेक्स हार्मोन बाध्यकारी ग्लोब्युलिन (SHBG) की अधिकता मुक्त टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन के स्तर को निम्न करता है
10% से कम मामलों में दवा के साइड इफेक्ट पुंस्तनवृद्धि के कारण के लिए बदनाम हैं
ऐसी ही एक दवा Spironolactone (Aldactone)  है जिस के साइड इफेक्टस ऐसे पाए गए हैं
एल्कोकल यानी की शराब का अत्याधिक सेवन हार्मोनल गडबडियां  उत्त्पन्न करता है मादा हारमोन एस्ट्रोजन की अधिकता के कारण छातियों में महिला के लक्षण दिखाई देते हैं  पुरुष की छात्तियाँ अधिक वसा का संचय करती हैं और वह मनुष्य असहज महसूस करता है
एक कारण मोटापा भी माना गया है पुंस्तनवृद्धि का परन्तु हमेशा यह कारण पुंस्तनवृद्धि का नहीं हो सकता है क्यूंकि कम मोटे और बिलकुल मोटे नहीं आदमियों में भी पुंस्तनवृद्धि के लक्षण पाए जाते है और किशोरावस्था में तो बिना मोटापे के लक्षण वाले लड़कों में स्तन-वृद्धि प्रदर्शित होती है
आक्सीटोसिन नामक हारमोन जो कि गाय-भैंस का दूध उतारने के लिए दक्षिण एशिया देशों में बहुतायत में प्रयोग होता है इस इंजेक्शन के बेल वाली सब्जियों में तीव्र वृद्धि के लिए भी प्रयोग किये जाने से मनुष्यों में हारमोन असंतुलन बढ़ गया है जिस में मादा में तो द्वितियिक लैंगिक लक्षण जल्दी दिखने लगते हैं और साथ-साथ नरों में भी मादा के द्वितियिक लक्षणों का प्रदर्शन होता है
व्ययाम, शारीर सौष्ठव निर्माण, तैराकी, बैंच प्रेस भारोत्तोलन, मासपेशीय उठान ड्रग्स और प्रोटीन व स्टेरोय्ड्स युक्त खाद्य भी इस समस्या के जनको में से एक हो सकते हैं
पुंस्तनवृद्धि  के प्रकार  सामान्यतः पुंस्तनवृद्धि के दो-तीन प्रकार हैं,
सबसे अधिक तो उभरे हुए गद्देदार चूचक प्रकार की पुंस्तनवृद्धि पायी जाती है और दूसरा प्रकार जो कि आम नहीं है परन्तु पुंस्तनवृद्धि का शुद्ध रूप है वो है स्तन ग्रंथियों के उत्तको का विकास हो जाना
पुरुष स्तन कैंसर के कारण छातियों का उभर जाना
पुंस्तनवृद्धि  के उपचार
किशोरावस्था में तो यह स्वत ही दूर हो जाती है
इसके अलावा पुंस्तनवृद्धि  के दो प्रमुख उपचार हैं,
१. लिपोसक्शन
२. शल्य चिकित्सा 
यहाँ आप शल्य चिकित्सा का विडियो देख सकते हैं (कृपया यह विडियो आप को व्यथित भी कर सकता है)  

सोमवार, 20 फरवरी 2012

क्यों जरूरी है विटामिन ई ? Why Vitamin-E is essential ?

क्यों जरूरी है विटामिन ई ? Why Vitamin-E is essential ?
विटामिन-ई अणु
आवश्यक शारीरिक क्रियाएँ पूरी करने के लिए शरीर को किसी न किसी रूप में सभी विटामिनो  की जरूरत होती है। क्योंकि विटामिनो  की कमी से शरीर में कई दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं।
यूँ तो सभी विटामिनो का अपना अपना महत्व है परन्तु इनमे से विटामिन ई अद्वितीय गुणों से भरपूर है। अधिकतर यह ही जानते हैं कि  झुर्रियों को रोकने में और नपुसंकता/बांझपन मे विटामिन ई लाभकारी है परन्तु सिर्फ ऐसा नहीं है माल बेचने की जुगतों ने इस महत्वपूर्ण विटामिन को केवल सेक्स और सौंदर्य विटामिन बना कर पेश किया है
वैज्ञानिकों का दावा है कि विटामिन ई अल्जाइमर रोगको रोकने में सहायक हो सकता है
तो आइए जानें विटामिन ई के और उसके कार्यों के बारे में;
विटामिन ई सब उम्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक एंटीऑक्सीडेंट प्रकार का विटामिन है और व्यायाम खेल-कूद से उत्पन्न हो सकने वाली आक्सिकरणीय नुकसान को रोकने में मदद करता है।विटामिन ई द्वारा मुक्त एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण इस आक्सिकरणीय नुकसान मे कोशिकाओं को सामान्य रूप से कार्य करने के लिए पूरी क्षमता के साथ प्रेरित करता हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया, कैंसर और हृदय रोग सहित कई विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।विटामिन ई सभी मांसपेशियों में ऐंठन को कम करने में मदद कर सकते हैं।
विटामिन ई कई रूपों मौजूद हैं:
अल्फा-tocopherol ; 
डी-अल्फा tocopherol(प्राकृतिक उत्पाद सोयाबीन तेल); 
डी-अल्फा tocopheryl; 
डीएल-अल्फा tocopheryl;
सिंथेटिक विटामिन ई; 
प्राकृतिक अल्फा, बीटा, डेल्टा, और गामा tocopherol सहित समावयवों का एक मिश्रण है।
विटामिन ई की कमी या अल्पता से हानियाँ; 
>विटामिन ई, खून में रेड बल्ड सेल या लाल रक्त कणिकाओं (R B C) को बनाने के काम आता है।
>शरीर में अनेक अंगों को सामान्य रूप में बनाये रखने में मदद करता है जैसे कि मांस-पेशियां, अन्य उत्तक। 
>यह विटामिन शरीर को आक्सीजन के एक नुकसानदायक रूप से बचाता है जिसे आक्सीजन रेडिकल्स(oxygen radicals)  कहा जाता है ये एंटीओक्सिडेंट (anti-oxidants) के रूप में हमे इस नुकसान से बचाता है 
>विटामिन ई , कोशिका के अस्तित्व बनाए रखने के लिये कोशिका की बाह्य झिल्ली को बनाए रखता है।
>विटामिन , शरीर के वासिय अम्लो को भी संतुलन में रखता है।
>समय से पहले हुये या अपरिपक्व नवजात शिशु (Premature infants) में विटामिन ई के कमी से खून की कमी हो जाता है। इससे उनमें एनिमीया (anemia) हो सकता है।
>बच्चों और व्यस्क लोगों में  विटामिन ई के अभाव से दिमाग की नसों की या न्युरोलोजीकल (neurological) समस्या हो सकती है।
>पुरुषों की नपुंसकता और नामर्दी का एक कारण शरीर में विटामिन ई की कमी हो जाना भी होता है।
>शिराओं के भंयकर घाव, गैग्रीन आदि विटामिन `´ के प्रयोग से समाप्त हो जाते है।
>विटामिन `´ की कमी से स्त्री के स्तन सिकुड़ जाते हैं और छाती सपाट हो जाती है।
>विटामिन `´ की कमी से थायराइड ग्लैण्ड तथा पिट्यूटरी ग्लैण्ड के कामकाज में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
>शरीर में विटामिन `´ की कमी हो जाने से किसी भी रोग का संक्रमण जल्दी लग जाता है।
>विटामिन `´ की कमी होते ही क्रमश: विटामिन `´ भी शरीर से नष्ट होने लगता है।
> विटामिन `´ झुर्रियाँ मिटाने और युवा बनाये रखने में विशेष सहायक होता है।
विटामिन ई की उपलब्धता
विटामिन ई की उपलब्धता;
विटामिन-ई सिर्फ प्राकृतिक स्त्रोत से ही लेने पर फायदेमंद है।विटामिन बी और सी पानी में घुलनशील है और यूरिन के जरिए बाहर चला जाता है, लेकिन विटामिन ए, डी और इ फैट सॉल्युबल हैं,ये शरीर में रह जाते हैं
विटमिन ई सी फूड, शाक-सब्जियों, अंकुरित अनाज, बिनोले, एवोकैडो, मेवे व राजमा, फ्लेक्स सीड(अलसी), सोयाबीन, लोबिया में पाए जाते हैं...ओमेगा 3 फैट्स सिर्फ ऑयली मछली जैसे सालमन में पाए जाते हैं यह गेहूँ के अंकुर के तेल (wheat germ oil) से भी प्राप्त होता है।
    Mustard Greens,Swiss Chard, Spinach, Kale and Collard Greens, Nuts,Tropical Fruits, Red Bell Peppers, Broccoli, Wheat Oils

जीवन रक्षक न होते हुए भी विटामिन  संसार भर के स्त्री-पुरुषों के लिए जीवन के समस्त आनन्द प्राप्त करने के लिए अति आवश्यक है।

शनिवार, 11 फरवरी 2012

क्यों जरूरी है रक्तदान ? Why Blood Donation ?

क्यों जरूरी है रक्तदान ? Why Blood Donation ?
रक्तदान का शरीर से निकाल कर जरूरतमंद व्यक्ति को देना रक्तदान कहलाता है बशर्ते इसके बदले कोई धन पुरस्कार आदि ना लिया जाए या  रक्तदान तब होता है जब एक स्वस्थ व्यक्ति स्वेच्छा से अपना रक्त देता है रक्तदान सही मायनों मे जीवनदान ही है। हमारे द्वारा किया गया रक्त का दान कई लोगो की जान बचाता है। इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हमारा कोई अपना खून के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझता है। उस वक्त हम नींद से जागते हैं और उसे बचाने के लिए खून के इंतजाम की जद्दोजहद करते हैं। देश भर में रक्तदान हेतु नाको, रेडक्रास, पंजीकृत ब्लडबैंक, सेना हस्पताल  जैसी कई संस्थाएँ लोगों में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रही है परंतु इनके प्रयास तभी सार्थक होंगे, जब हम स्वयं रक्तदान करने के लिए आगे आएँगे और अपने मित्रों व रिश्तेदारों को भी इस हेतु आगे आने के लिए प्रेरित करेंगे।
जीवन बचाने के लिए खून चढाने की जरूरत पडती है। दुर्घटनारक्‍तस्‍त्रावप्रसवकाल और ऑपरेशन आदि अवसरों में शामिल है,जिनके कारण अत्‍यधिक खून बह सकता है और इस अवसर पर उन लोगों को खून की आवश्‍यकता पडती है। थेलेसिमियाल्‍यूकिमियाहीमोफिलिया जैसे अनेंक रोगों से पीडित व्‍यक्तियों के शरीर को भी बार-बार रक्‍त की आवश्‍यकता रहती है अन्‍यथा उनका जीवन खतरे में रहता है। जिसके कारण उनको खून चढाना अनिवार्य हो जाता है
स्वैच्छिक रक्तदान में केवल 450 मिलीलीटर रक्त निकाला जाता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मुताबिक आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 450 मिली खून तीन जिन्दगियों को बचा सकता है। सही समय पर रक्त न मिलने की वजह से प्रति वर्ष देश में बहुत सारे जरूरतमंदों की मौत हो जाती है। सड़क दुर्घटना, गर्भावस्‍था से गुजर रही महिलाएं, बड़ी सर्ज़री वाले मरीज, कैंसर के शिकार व्यक्तियों व थैलीसीमिया के शिकार बच्चों को सुरक्षित रक्त की बेहद आवश्यकता होती है। 
 रक्त से रक्‍त अवयवों को अलग कर जरूरतमन्द मरीजों को चढ़ाने से रक्‍त की बचत होती है, जो इस देश के लिए आवश्‍यक है । एक यूनिट ब्लड से कई अवयव तैयार किए जा सकते हैं, जैसे- लाल रक्तकणिकाएं, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा आदि। किसी मरीज को केवल वही अवयव चढ़ाया जाता है जिसकी उसे जरूरत होती है।
रक्तदान के फायदे 
बीएल कपूर मेमोरियल अस्पताल के ट्रांसफ़्यूजन मेडिसीन विभाग की डॉ. रसिका सेतिया के अनुसार स्‍वैच्छिक रक्तदान से फायदे ही फायदे हैं । उनके अनुसार रक्तदान करके न सिर्फ किसी की ज़ि़न्दगी बचाने जैसी अनमोल खुशी मिलती है बल्कि इससे हमारी सेहत को भी लाभ पहुंचता है।
* दिल के रोगों की संभावना कम होती है- यह पाया गया है की खून में लौह तत्व का स्तर बढ़ने पर हृदय रोग की संभावना बढ़ जाती है। नियमित तौर पर रक्तदान करने से फालतू लौह तत्व शरीर से बाहर (खासकर पुरुशों के मामले में) चला जाता है। इस प्रकार हृदयाघात का जोखिम एक तिहाई तक कम हो जाता है।
* नई लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ता है- रक्तदान करने वाले व्यक्ति के शरीर से खून निकल जाने पर लाल रक्त कोशिकाओं में कमी आ जाती है। इनकी पुन: पूर्ति के लिए हमारी मज्जा तुरन्त नई कोशिकाओं के उत्पादन में लग जाती है और इस तरह हमारा खून स्वच्छ व नया हो जाता है।
* कैलोरी घटती है- नियमित तौर पर रक्तदान करके आप फिट रह सकते हैं। 450 मिली रक्तदान करने से आप अपने शरीर की 650 कैलोरी कम कर सकते हैं।
* प्राथमिक रक्त परीक्षण हो जाता है- इन सब फायदों के साथ रक्तदाता के खून का एक छोटा सा परीक्षण (रक्तदान के पूर्व व पश्चात्) भी हो जाता है। इसमें शामिल होते हैं- ऐचआईवी, ऐचबी स्तर की जांच, रक्तचाप, शरीर का वजन आदि।
रक्तदान से यूरिक अम्ल और केलस्ट्रोल की मात्रा भी नियंत्रित रहती है 

LOWER IRON LEVELS,Reduce the chance of heart diseases,Enhance the production of new Red Blood Cells,REPLENISH BLOOD'Helps in fighting hemochromitosis,Burns calories,Basic blood test is done & REDUCE CANCER RISK



कौन कौन कर सकता है रक्तदान : 


जिसकी आयु 18 से 65 वर्ष के बीच हो।
जिसका वजन (100 पौंड) 48 किलों से अधिक हो।
जो क्षय रोग, रतिरोग, पीलिया, मलेरिया, मधुमेंह, एड्स आदि बीमारियों से पीडित नहीं हो।
जिसने पिछले तीन माह से रक्‍तदान नहीं किया हो।
रक्‍तदाता ने शराब अथवा कोई नशीलीदवा न ली हो।
गर्भावस्‍था तथा पूर्णावधि के प्रसव के पश्‍चात शिशु को दूध पिलाने की 6 माह की अवधि में किसी स्‍त्री से रक्‍तदान स्‍वीकार नहीं किया जाता है।
आओ प्रतिज्ञा करें कि हम नियमित रक्तदाता बनेंगे
संदर्भ सूत्र :१.http://en.wikipedia.org/wiki/Blood_donation




रविवार, 22 जनवरी 2012

क्या हैं मनोसक्रिय औषधियाँ(ड्रग्स) ? What is the Psychoactive Drugs?

क्या हैं मनोसक्रिय औषधियाँ(ड्रग्स) ? What is the Psychoactive Drugs?
मनोसक्रिय औषधियाँ  
आदिम काल से ही मनुष्य ऐसी दवाओं का प्रयोग करता आ रहा है जो दिमाग पर असर करती हैं जिंदगी में नीरस काम,तनाव,प्रतिबल,अत्याधिक विपत्ति का सामना कर पाने में असमर्थ रहने पर वो कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ लेने लगता हैं जिन के सेवन से कुछ समय के लिए मनुष्य के  व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिलता है। यह  मनोसक्रिय औषधियाँ  मनुष्य की मनोदशा,सोच,चेतना एवं बर्ताव को बदल देती हैं यह  केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र पर अपना प्रभाव दिखाती हैं जिस कारण मनुष्य अपने चेतना के स्तर में वृद्धि पता है  यह मनोसक्रिय औषधियाँ वानस्पतिक रूप और रासायनिक संश्लेषित रूप यानि टेबलेट्स,केप्स्युल्स के रूपों में मिलती हैं वैध और अवैध रूप से इनका वैश्विक व्यपार होता है
हालांकि इन दवाओं का शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार के विकारों के इलाज के लिए उपचारात्मक उद्देश्य से  इस्तेमाल किया जाता है परन्तु ये अपने मनोरंजक प्रयोग के लिए भी कुख्यात हैं। इन दवाओं की सदा के लिए  निर्भरता लत का कारण बन जाती है। मनोसक्रिय औषधियाँ  मनुष्य के मस्तिष्क की भावनात्मक स्तिथि पर गहरा प्रभाव डालती हैं जिस की बाद में आदत बन जाती है क्योंकि  मनोसक्रिय पदार्थ चेतना और मूड में व्यक्तिपरक परिवर्तन लाते हैं। इनके उपयोगकर्ता को कईं प्रकार के सुखद अनुभव जैसे उत्साह में वृद्धि या बढ़ी हुई सतर्कता जैसे कई मनो-अनुभव होते हैं स्वास्थ्य जोखिमों या नकारात्मक परिणामों के बावजूद भी इनका जरूरत से ज्यादा प्रयोग किया जाता है। 
मनोसक्रिय औषधियाँ को  उनके औषधीय प्रभाव के अनुसार तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है
१. उत्तेजक 
Stimulants
२. अवसादक 
Depressants
३. वीभ्राम्क या विभ्रम्कजनक 
Hallucinogenic
१.उत्तेजक:उत्तेजक मनोसक्रिय पदार्थ  कॉफी, तंबाकू, चाय, एम्फ़ैटेमिन, कोको, ब्राजील की औषधि गुअराना ,  एफीड्रा , खत, और कोका आदि उत्तेजक हैं  इस श्रेणी में शामिल पदार्थों दिमाग को उत्तेजित करते हैं जगाते हैं और उत्साह का कारण भी बनते है लेकिन यह दिमाग की धारणा को प्रभावित नहीं करते परन्तु शारीरिक प्रतिक्रियाओं को तेज कर देते हैं ।  
२.अवसादक:अवसादक मनोसक्रिय पदार्थ कोडीन,हेरोइन,एल्कोहल, बारबिट्यूरेट,फिनोबार्बीटल,सिकोनेल रेड्स,प्रशान्तक(वेलियम,लिब्रियम,रिस्प्रिन),कुछ वाष्पशील विलायक (पेंट,थिनर,कार्बनटेट्राक्लोराइड,बेंजीन,
टोलूइन)आदि,यह दिमाग की धारणा को कम प्रभावित करते हैं और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मंद कर देते हैं शराब, मस्तिष्क पर सीधे एक 'अवसादक' के रूप में प्रभाव के लिए सक्षम हैl यह मस्तिष्क के कार्य को धीमा कर देता हैl और उस व्यक्ति को झूठे अर्थ में विश्राम, या उनके अपराध, समस्याओं को अस्थायी तौर से बचने की अनूभूति देता है, मस्तिष्क शुन्य होने के कारण दर्द, अन्य विचार भी नहीं आते और मस्तिष्क के सामान्य निरोधात्मक नियंत्रण या विवेक की क्षति होती है l जिसके कारण अधिकांश लोग अधिक पीने पर नशे में धुत होकर उन्मुक्त बहक जाते हैं  l
३.वीभ्राम्क या विभ्रम्कजनक:ये वो पदार्थ हैं जो चेतना को गडबडाए बिना दिमागी जानकारी को विकृत कर देते हैं दिमागी धारणा बदल जाती है  l
मरिजुआना


इसके सेवन से मनुष्य दृढविश्वाश जैसी अवस्था में आ जाता है और वो ऊँचाई से कूद सकता है,वाहन के आगे आ सकता है,खुद को गोली मार सकता है 
दृढविश्वाश में वो 'कुछ नहीं बिगड़ सकता' जैसी अवस्था में आ जाता है
L.S.D.,मेस्कलिन,सीलोसायिबिन,भांग व भांग के अन्य उत्पाद चरस,गंजा,मरिजुआना,हशीश,हेम्प,अश्वगंधा आदि हैं 
यहाँ एक अन्य जिक्र भी जरूरी है 


मदात्यय या एल्कोहलिसम: शराब की लत का संकेत,शराब का एक अनिवार्य आभ्यासिक सेवन होता हैl यह ऐसे कि व्यक्ति द्वारा इस आदत को आसानी से छोड़ना संभव नहीं है, कभी कभी भी जब पीने के प्रतिकूल प्रभाव स्वास्थ्य, परिवार और सामाजिक जीवन को प्रभावित होना आरंभ हो जाता है तब भी यह नहीं छूट सकतीl 
शराब पीना सदा एक अभिशाप रहा है यह मूलतः इथाइल एल्कोहल है जो किण्वन से शर्करा से प्राप्त होता है मीथायल एल्कोहल का भी प्रयोग किया जाता है जो की अत्यंत विषैला है और इसके सेवन से मृत्यु और कम से कम अन्धपन तो हो ही जाता है मादक पेयों को सामान्यतः तीन सामान्य वर्गों में विभाजित किया जाता है: बीयर, वाइन और स्प्रिट्स, शराब उद्धिपक नहीं है बल्कि यह केन्द्रीय तंत्रिकातंत्र को दबाता है।यह शामक है और इसके अत्याधिक सेवन से तंत्रिकाशोथ हो जाता है।एक तरह  से यह भी विभ्रम्क ही है ।शराब के सेवन से यकृत सब से ज्यादा प्रभावित होता है और यह सिरोसिस रोग का कारण बनता है 

क्या एक व्यक्ति को उपचार के रूप मे मनोसक्रिय दवाओं लेना चाहिए?
यह व्यक्ति और विकार के प्रकार पर निर्भर करता है. यदि अवसाद या चिंता है तो एक महीने के लिए दवा लेने के बाद  फिर कभी आवश्यकता नहीं पड़ती है और यह भी महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपने चिकित्सक के दिशानिर्देशों का पालन करें 
यह कड़वा सच है कि आज पूरा विश्व इन ड्रग्स की चपेट मे है किशोर,युवा,वयस्क,बुजुर्ग,महिलायें भी चिंता,तनाव,कार्यभार,शौक आदि कारणों से ड्रग्स लेती हैं भारत मे भी कम आय वाले व्यक्ति कुछ सस्ते नशो की चपेट मे अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं आओ मिल-जुल कर इन नशों को अपने जीवन से दूर कर वास्तविक जीवन का आनंद लें